देवो के देव महादेव का निवास स्थान “कैलाश मानसरोवर”

श्री आनंदीलाल जोशी जी

महाकाल मंदिर के पूर्व प्रशासक श्री आनंदीलाल जोशी जी का यात्रा अनुभव|

कालांतर से हिन्दू मान्यताओ के अनुसार त्रिदेवों में एक देव “शिव” हैं। शिव सभी को समान दृष्टि से देखते है इसलिये उन्हें महादेव भी कहा जाता है। शिव के कुछ प्रचलित नाम: महाकाल, आदिदेव, किरात, शंकर, चन्द्रशेखर, जटाधारी, नागनाथ, मृत्युंजय (मृत्यु पर विजयी), त्रयम्बक, महेश, विश्वेश, महारुद्र, विषधर, नीलकण्ठ, महाशिव, उमापति (पार्वती के पति), काल भैरव, भूतनाथ, ईवान्यन (तीसरे नयन वाले), शशिभूषण आदि। भगवान शिव को रूद्र नाम से जाता है रुद्र का अर्थ है रुत दूर करने वाला अर्थात दुखों को हरने वाला अतः भगवान शिव का स्वरूप कल्याण कारक है। यह व्यक्ति की चेतना के अन्तर्यामी हैं। इनकी अर्धांगिनी (शक्ति) का नाम माता “पार्वती” है। इनके पुत्र कार्तिकेय और गणेश हैं, तथा पुत्री अशोक सुंदरी हैं। शिव अधिक्तर चित्रों में योगी के रूप में देखे जाते हैं और उनकी पूजा शिवलिंग तथा मूर्ति दोनों रूपों में की जाती है। शिव के गले में नाग देवता वासुकी विराजित हैं और हाथों में डमरू और त्रिशूल लिए हुए हैं। कैलाश में उनका वास है। यह शैव मत के आधार है। इस मत में शिव के साथ शक्ति सर्व रूप में पूजित है। आज हम आपको कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील की यात्रा के अनुभव “महाकाल मंदिर के पूर्व प्रशासक श्री आनंदीलाल जोशी जी” के द्वारा बताया जायेगा और साथ ही उसके अनसुने रहस्य, इतिहास, पौराणिक और वैज्ञानिक मान्याओं के बारे में विस्तार से बताएँगे |

Beautiful Scenery of Kailash Mountain

कहा हे भगवान शिव का निवास

शिव पुराण, स्कंद पुराण, मत्स्य पुराण आदि में कैलाश खंड नाम से अलग ही अध्याय है जिसमे वार्णित हे की मानसरोवर झील के पास स्थित कैलाश पर्वत पर भगवान शिव साक्षात विराजमान हैं। कैलाश पर्वत और मानसरोवर को धरती का केंद्र माना जाता है। यह हिमालय के केंद्र में है। कैलाश पर्वत पर साक्षात भगवान शंकर विराजे हैं जिसके ऊपर स्वर्गलोक और नीचे मृत्यलोक है,  इसकी बाहरी परिधि 52 किमी की है।

“हिमालयात् समारभ्य यावत् इन्दु सरोवरम्। तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थान प्रचक्षते||”

अर्थात: हिमालय से प्रारंभ होकर इन्दु सरोवर (हिन्द महासागर) तक यह देव निर्मित देश हिन्दुस्थान कहलाता है। 

कैलाश पर्वत एक विशालकाय पिरामिड है, जो करीब करीब 100 छोटे पिरामिडों का केंद्र है। कैलाश पर्वत एकांत स्थान पर स्थित है, जहां कोई भी बड़ा पर्वत नहीं है। कैलाश पर्वत समुद्र सतह से 22068 फुट ऊंचा है तथा हिमालय से उत्तरी क्षेत्र में तिब्बत में स्थित है। कैलाश पर्वत की 4 दिशाओं से 4 नदियों का उद्गम हुआ है- ब्रह्मपुत्र, सिन्धु, सतलज व करनाली। इन नदियों से ही गंगा, सरस्वती सहित चीन की अन्य नदियां भी निकली हैं। कैलाश की चारों दिशाओं में विभिन्न जानवरों के मुख हैं जिसमें से नदियों का उद्गम होता है। पूर्व में अश्वमुख है, पश्चिम में हाथी का मुख है, उत्तर में सिंह का मुख है, दक्षिण में मोर का मुख है।

Mountains in Kailash

कैलाश मानसरोवर के नजदीक ही यमद्वार है। यहीं से शुरू होती हे कैलाश स्पर्श स्थान और कैलाशजी की परिक्रमा है। यमद्वार से करीब 12 किमी की यात्रा प्रारंभ होती है। सुनसान रास्ते के दोनों तरफ पथरीले और बर्फ से ढंके पहाड़ दिखाई देते हैं। दोनों पहाड़ों के बीच बर्फ की नदी अपने अस्तित्व का अहसास कराती है। कैलाश की संपूर्ण परिक्रमा लगभग 50 किलोमीटर की है, जिसे यात्री प्रायः तीन दिनों में पूरा करते हैं। यह परिक्रमा कैलाश शिखर के चारों ओर के कमलाकार शिखरों के साथ होती है। कैलाश शिखर अस्पृश्य है। यात्रा मार्ग से लगभग ढाई किलोमीटर की सीधी चढ़ाई करके ही इसे स्पर्श किया जा सकता है। यह चढ़ाई पर्वतारोहण की विशिष्ट तैयारी के बिना संभव नहीं है। चूंकि तिब्बत अब चीन के अधीन है, अतः कैलाश पर्वत चीन में आता है। मानसरोवर झील से घिरा होना कैलाश पर्वत की धार्मिक महत्ता को और अधिक बढ़ाता है। 

Yamdwar – An ultimate gateway for salvation

क्या हे मानसरोवर झील?:

Mansarovar lake.

मानसरोवर एक संस्कृत शब्द मानस तथा सरोवर को मिल कर बना है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है- मन का सरोवर। मानसरोवर झील लगभग 320 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैली हुई है। इसके उत्तर में कैलाश पर्वत तथा पश्चिम में रक्षातल झील है। कहते हैं कि मानसरोवर वह झील है जहां माता पार्वती स्नान करती हैं। पुराणों के अनुसार, समुद्र तल से 17 हजार फुट की उंचाई पर स्थित 300 फुट गहरे मीठे पानी की इस मानसरोवर झील की उत्पत्ति भगीरथ की तपस्या से भगवान शिव के प्रसन्न होने पर हुई थी। पुराणों के अनुसार, भगवान शंकर द्वारा प्रकट किए गए जल के वेग से जो झील बनी, कालांतर में उसी का नाम ‘मानसरोवर’ हुआ।

ऐसी भी मान्यता है कि कोई व्यक्ति मानसरोवर में एक बार डुबकी लगा ले, तो वह ‘रुद्रलोक’ पहुंच सकता है। मानसरोवर पहाड़ों से घिरी झील है, जिसे पुराणकार ‘क्षीर सागर’ कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि महाराज मांधाता ने मानसरोवर झील की खोज की और कई वर्षों तक इसके किनारे तपस्या की थी, जो कि इन पर्वतों की तलहटी में स्थित है।

51 शक्तिपीठो में से एक हे मानसरोवर पाषाण शिला:

Manas Shakti Peeth

एक अन्य मान्यता के अनुसार, परमपिता परमेश्वर के आनन्द अश्रुओं को भगवान ब्रह्मा ने अपने कमण्डल में रख लिया था तथा इस भूलोक पर ‘त्रियष्टकं’ (तिब्बत) स्वर्ग समान स्थल पर ‘मानसरोवर’ की स्थापना की। शाक्त ग्रंथ के अनुसार, देवी सती का दायां हाथ इसी स्थान पर गिरा था, जिससे यह झील तैयार हुई। इसलिए यहां एक पाषाण शिला को उसका रूप मानकर पूजा जाता है। इसलिए इसे 51 शक्तिपीठों में से एक माना गया है।

मीठे और खारे पानी की झील का रहस्य:

कैलाश पर्वत के पास दो मुख्य सरोवर हैं- पहला, मानसरोवर जो दुनिया की शुद्ध पानी की उच्चतम झीलों में से एक है और जिसका आकार सूर्य के अंश के समान है। और दूसरा, यहां पर लगभग 225 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र, 84 किलोमीटर परिधि तथा दूसरा 150 फुट गहरी राक्षस नामक झील, जो दुनिया की खारे पानी की उच्चतम झीलों में से एक है और जिसका आकार चन्द्र के अंश के समान है। ये दोनों झीलें सौर और चन्द्र बल को प्रदर्शित करती हैं जिसका संबंध सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा से है। जब दक्षिण से देखते हैं तो एक स्वस्तिक चिह्न वास्तव में देखा जा सकता है। इन दो सरोवरों के उत्तर में कैलाश पर्वत है। 

कुबेर की नगरी:

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी के पास कुबेर की नगरी है। यहीं से महाविष्णु के कर-कमलों से निकलकर गंगा कैलाश पर्वत की चोटी पर गिरती है, जहां प्रभु शिव उन्हें अपनी जटाओं में भर धरती में निर्मल धारा के रूप में प्रवाहित करते हैं। इसी में शेषनाग शैय्‍या पर भगवान विष्णु व लक्ष्मी विराजित हों पूरे संसार को संचालित कर रहे हैं। यह क्षीर सागर विष्णु का अस्थाई निवास है। कैलाश पर्वत के दक्षिण भाग को नीलम, पूर्व भाग को क्रिस्टल, पश्चिम को रूबी और उत्तर को स्वर्ण रूप में माना जाता है।

(ॐ) ओम पर्वत:

Om Parvat

हिन्दू धर्म का पवित्र शब्द ‘ॐ’ प्राकृतिक तरीके से एक पर्वत के रूप में स्थित हे | धारचुला के रास्ते कैलाश-मानसरोवर की यात्रा पर जाने वाले तीर्थ-यात्रियों को रास्ते में (ॐ) ओम पर्वत के दर्शन होते हैं। ओम पर्वत की ऊचाई लगभग  6191 मीटर हे जो हिमालय पर्वत श्रृंखला के पहाड़ों में से एक है। यह ॐ पर्वत नाबीडागं से देखा जा सकता है। इस पहाड़ पर बर्फ के बीच ‘ॐ’ शब्द का आकार दिखता। इसी कारण इस स्थान का नाम ओम (ॐ) पर्वत पड़ा। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, हिमालय पर कुल 8 प्राकृतिक ओम की आकृतियां बनी हुई हैं। इनमें से अबतक केवल ओम पर्वत की ही आकृति के बारे में पता चल सका है। ये चोटी हिंदू धर्म के अलावा बौद्ध और जैन धर्म में भी विशेष धार्मिक महत्व रखती है। इस पर्वत के दूसरी तरफ पार्वती मुहर नाम का एक पहाड़ है जो इसी नाम के एक दर्रे से जुड़ा हुआ है। ओम् पर्वत को लेकर भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद है। दोनों देश इस पर्वत के पास सीमा रेखा को लेकर सहमत नहीं है। पर पहाड़ पर ‘ॐ’ भारत की ओर दिखता है जबकि इसका पृष्ठ भाग नेपाल की ओर पड़ता है। (ओम पर्वत पर चढ़ना आज तक संभव नहीं हो पाया है।) एक प्रकार से यह स्थान कैलाश और आदि कैलाश के बीच में स्थित है। जो एक शानदार दृश्य प्रदान करता है। यहाँ आने वाले यात्री इस स्थान से अन्नपूर्णा की विशाल चोटियों को भी देख सकते हैं। स्थानीय रहवासियों का मानना हे की इस पर्वत पर बर्फ गिरने से प्राकृतिक रूप से ओम (ॐ) की ध्वनि उत्पन्न होती है।

यात्रा की तैयारी कैसे करे |

Mansarovar Tour Map

यदि आप कैलाश पर्वत और मानसरोवर जा रहे हैं तो आपको 75-80 किलोमीटर पैदल मार्ग पर चलने और उबड़-खाबड पहाड़ियों पर चढ़ने के लिए तैयार रहना होगा। इसके लिए जरूरी है कि आपका शरीर तंदरुस्त और मजबूत तथा हर तरह के वातावरण और थकान को सहन करने वाला हो। यह यात्रा उत्तराखंड, हिमाचल, सिक्किम और नेपाल के काठमांडू से प्रारंभ होती है। इसमें सिक्किम के नाथुरा दर्रा से जाना सबसे सुरक्षित है। यदि नाथुरा दर्रा से यात्रा करते हैं तो 10-15 किलोमीटर तक ही पैदल चलना होगा। यहां का तापमान शू्न्य से नीचे -2 सेंटीग्रेड तक हो जाता है। इसलिए ऑक्सीजन सिलेंडर भी साथ होना जरूरी है। साथ ही मुंह से बजाने की एक सीटी व कपूर की थैली आगे-पीछे होने पर व सांस भरने पर उपयोग की जाती है। आवश्यक सामग्री, गरम कपड़े आदि रखें और अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार घोड़े-पिट्टू किराए से लें।

कैलाश पर्वत पहुचने का मार्ग:

कैलाश पर्वत की यह पवित्र यात्रा भारत और चीन के विदेश मंत्रालयों द्वारा आयोजित की जाती है। लगभग एक माह चलने वाली इस पवित्र यात्रा में काफी दुरुह मार्ग भी आते हैं अक्टूबर से अप्रैल तक इस क्षेत्र के सरोवर व पर्वतमालाएं दोनों ही हिमाच्छादित रहते हैं। सरोवरों का पानी जमकर ठोस रूप धारण किए रहता है। जून से इस क्षेत्र के तामपान में थोड़ी वृद्धि शुरू होती है। नेपाल के रास्ते यहां तक पहुंचने में करीब 28 से 30 दिन का समय लगता है अर्थात यह यात्रा यदि कोई व्यवधान नहीं हुआ तो घर से लेकर पुन: घर तक पहुंचने में कम से कम 45 दिनों की होती है। फिलहाल डोकलाम विवाद के बाद यह रास्ता पुन: बंद कर दिया गया है।

प्रधानमंत्री मोदी सरकार के अनुसार ‘नाथुला’ के रास्ते से कई सुविधाएं हैं। इससे मोटर-गाड़ी से कैलाश मानसरोवर तक यात्रा की जा सकती है,  इससे विशेषकर बूढे तीर्थयात्रियों को लाभ होगा। तीर्थयात्रा कम समय में पूरी की जा सकेगी और भारत से काफी संख्या में तीर्थयात्री वहां जा सकेंगे। कई मायनों में यह नया रास्ता बरसात के मौसम में भी सुरक्षित होगा।

1. सड़क मार्ग: भारत सरकार सड़क मार्ग द्वारा मानसरोवर यात्रा प्रबंधित करती है। यहां तक पहुंचने में करीब 28 से 30 दिनों तक का समय लगता है। यहाँ के लिए सीट की बुकिंग एडवांस भी हो सकती है और निर्धारित लोगों को ही ले जाया जाता है, जिसका चयन विदेश मंत्रालय द्वारा किया जाता है।

२. वायु मार्ग: वायु मार्ग द्वारा काठमांडू तक पहुंचकर वहां से सड़क मार्ग द्वारा मानसरोवर झील तक जाया जा सकता है।

3. कैलाश तक जाने के लिए हेलिकॉप्टर की सुविधा भी ली जा सकती है। काठमांडू से नेपालगंज और नेपालगंज से सिमिकोट तक पहुंचकर, वहां से हिलसा तक हेलिकॉप्टर द्वारा पहुंचा जा सकता है। मानसरोवर तक पहुंचने के लिए लैंडक्रूजर का भी प्रयोग कर सकते हैं।

4. काठमांडू से लहासा के लिए ‘चाइना एयर’ वायुसेवा उपलब्ध है, जहां से तिब्बत के विभिन्न कस्बों- शिंगाटे, ग्यांतसे, लहात्से, प्रयाग पहुंचकर मानसरोवर जा सकते हैं।5. लेकिन अब नाथुरा दर्रा वाला मार्ग जब खोल दिया जाएगा तो उपरोक्त रास्तों के अलावा आप उत्तराखंड के बजाय सिक्किम या हिमाचल से भी यह यात्रा शुरु कर सकते हैं। उक्त दोनों राज्यों के पर्यटन मंत्रालयों से इस संबंध में संपर्क किया जा सकता है।

By : Manish Varun Yadav

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