“क्यों समां गयी द्वारिका समुद्र में”

पिछले आर्टिकल्स में हम आपको दो धामों रामेश्वरम धाम और जगन्नाथ पूरी धाम के बारे में विस्तार से बता चुके हे, इस बार हम आपको तीसरे धाम “द्वारका धाम” के बारे में बताने जा रहे है। भारत के गुजरात में स्थित देवभूमि द्वारका एक हिन्दू तीर्थस्थल है। द्वारिका नगर का परिचय कुछ ऐसा हे की कई द्वारों का शहर होने के कारण इसका नाम द्वारिका पड़ा। गोमती नदी के तट पर स्थापित यह मंदिर बहुत ही सुंदर व अद्भुत है यही नहीं इस स्थान पर गोमती नदी अरब सागर से मिलती है। इस शहर के चारों ओर बहुत ही लंबी दीवारे थी जिसमें कई द्वार थे। वह दीवार आज भी समुद्र के तल में स्थित है। भारत के सबसे प्राचीन नगरों में से एक है द्वारिका नगर।

ये ७  नगर अतिप्राचीन हैं

• द्वारिका

• मथुरा

• काशी

• हरिद्वार

• अवंतिका

• कांची और अयोध्या। 

द्वारिका को द्वारावती, कुशस्थली, आनर्तक, ओखा-मंडल, गोमती द्वारिका, चक्रतीर्थ, अंतरद्वीप, वारिदुर्ग, उदधिमध्यस्थान भी कहा जाता है। यह हिन्दुओं के साथ सर्वाधिक पवित्र तीर्थों में से एक तथा चार धामों में से एक है। यह सात पुरियों में एक पुरी यह नगरी भारत के पश्चिम में समुन्द्र के किनारे पर बसी है। हिन्दू धर्मग्रन्थों के अनुसार, भगवान श्री कॄष्ण ने इसे बसाया था। 

गुजरात में स्थित यह पवित्र कृष्ण मंदिर सबसे सुंदर मंदिर के रुप में जाना जाता है। मंदिर में स्थापित श्री कृष्ण की द्वारकाधीश के रुप में पूजा की जाती है। द्वारकाधीश मंदिर हिंदूओं का पवित्र धाम चार धाम में से एक तीर्थ माना जाता है। द्वारकाधीश उपमहाद्वीप पर भगवान विष्णु का १०८ वां दिव्य मंदिर है, इस अतिप्राचीन मंदिर को हिंदुओं का प्रमुख व महत्वपूर्ण स्थान के रुप में देखा जाता है। द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण की राजधानी द्वारका ही थी और आज कलयुग में यह स्थान भक्तों के लिए महातीर्थ धाम माना जाता है। यहां द्वारिकाधीश धाम के अलावा अनेक मंदिर और सुंदर, मनोरम और रमणीय स्थान हैं।

क्यों बसी श्री कृष्ण ने द्वारका नगरी?

जब भगवान विष्णु अवतार भगवान श्री कृष्ण ने राजा कंस का वध कर दिया था तो कंस के श्वसुर मगधपति जरासंध ने कृष्ण और यादववंश (यदुओं) का नामोनिशान मिटा देने की ठान रखी थी। वह मथुरा और यादवों पर बारंबार आक्रमण करता था। अंतत: यादवों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए श्री कृष्ण ने मथुरा को छोड़ने का निर्णय लिया। विनता के पुत्र गरूड़ की सलाह एवं ककुद्मी के आमंत्रण पर कृष्ण कुशस्थली आ गए। वर्तमान द्वारिका नगर कुशस्थली के रूप में पहले से ही विद्यमान थी, कृष्ण ने इसी उजाड़ हो चुकी नगरी को पुनः बसाया। द्वारिका का प्राचीन नाम कुशस्थली है। प्राचीन पौराणिक कथाओं के अनुसार महाराजा रैवतक के समुद्र में कुश बिछाकर यज्ञ करने के कारण ही इस नगरी का नाम कुशस्थली हुआ था। 

द्वारिका मंदिर की हिंदू पौराणिक कथा:

हिंदू पौराणिक कथाओं और ग्रंथों के अनुसार, द्वारका कृष्ण द्वारा भूमि के एक टुकड़े पर बनाया गया था जिसे समुद्र से पुनः प्राप्त किया गया था। ऋषि दुर्वासा ने एक बार श्री कृष्ण और उनकी पत्नी रूक्मणी जी का दर्शन किया। ऋषि ने कामना थी  कि भगवान श्रीकृष्ण और रूक्मणी उनके साथ उनके निवास स्थान पर चले। यह भगवान श्रीकृष्ण और रूक्मणी सहमत हो गये और उनके निवास स्थान के लिए ऋषि के साथ चलना शुरू कर दिया। कुछ दूरी के बाद, रुक्मणी थक गई और उन्होंने श्रीकृष्ण से पानी का अनुरोध किया। श्रीकृष्ण ने एक पौराणिक छेद खोला और पानी को गंगा नदी से उस जगह लाये। ऋषि दुर्वासा उग्र थे और रुक्मिणी को उसी जगह रहने के लिए शाप दिया था। द्वारकाधीश मंदिर उस जगह पर माना जाता है जहां रूक्मणी खड़ी थी।

कुछ अन्य मान्यताओं के अऩुसार श्री कृष्ण के पोते ने किया था मंदिर का निर्माण जिनका नाम वज्रभ कहा जाता हे, द्वारा किया गया था और १५ वीं-१६ वीं सदी में मंदिर का विस्तार हुआ था। पुरातत्व विभाग द्वारा के अनुसार यह मंदिर करीब २०००-२२०० साल पुराना है। इसे जगत मंदिर के नाम से भी जाना जाता हे, यह द्वारकाधीश मंदिर ५ मंजिला ऊँचा इमारत का तथा ७२ स्तंभों द्वारा स्थापित किया गया है। मंदिर का उच्च शिखर करीब ७८.३  मीटर ऊंची है। मंदिर के ऊपर स्थित ध्वज सूर्य और चंद्रमा को दर्शाता है, जो कि यह संकेत मिलता है कि पृथ्वी पर सूर्य और चंद्रमा मौजूद होने तक भगवान श्री कृष्ण होंगे। इस मंदिर का झंडा दिन में ५ बार बदला जाता है, लेकिन प्रतीक एक ही रहता है।

क्यों समां गयी द्वारिका समुद्र में:

श्री कृष्ण भगवान श्री हरी विष्णु के ८  वे अवतार कहे जाते हे, द्वापरयुग में भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण अवतार लेकर अधर्मियों का नाश किया। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म कारागार में हुआ था। इनके पिता का नाम वसुदेव और माता का नाम देवकी था। कंस का वध भी भगवान श्रीकृष्ण ने ही किया। महाभारत के युद्ध में अर्जुन के सारथि बने और दुनिया को गीता का ज्ञान दिया। धर्मयुद्ध कर उनकी जीत कराई, शिशुपाल और दुर्योधन जैसे अधर्मी राजाओं को मिटाया। धर्मराज युधिष्ठिर को राजा बना कर धर्म की स्थापना की। भगवान विष्णु का ये अवतार सभी अवतारों में सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। श्री कृष्ण ने उन्होने द्वारका में किया, इसलिए द्वारका को कृष्ण की कर्म स्थली भी कहा जाता हे, यहीं बैठकर उन्होने सारे देश की बागडोर अपने हाथ में संभाली। द्वारका उस जमाने में राजधानी बन गई थीं। बड़े-बड़े राजा यहां बहुत-से मामले में भगवान कृष्ण की सलाह लेते थे। इस जगह का धार्मिक महत्व तो है ही, रहस्य भी कम नहीं है। मान्यतो के अनुसार कहा जाता है कि कृष्ण की मृत्यु के साथ उनकी बसाई हुई यह नगरी समुद्र में डूब गई। मृत्यु पश्चात् श्री कृष्ण वापस भगवान विष्णु में लीन हो गये थे और इनके साथ ही बसाई हुयी द्वारिका भी समुद्र में लीन हो गयी थी जहा भगवान विष्णु का वास हैं।, दूसरी प्रचलित मान्यता यह हे की द्वारका कृष्ण द्वारा भूमि के एक टुकड़े पर बनाया गया था जिसे समुद्र से पुनः प्राप्त किया गया था। आज भी यहां उस नगरी के अवशेष मौजूद हैं। प्राचीन द्वारिका नगरी आज भी अरब सागर की तलहटी में स्थित हे जिसकी कई वैज्ञानिको ने पुष्ठी भी की हैं।

Mr. Manish Varun Yadav Research Scholar manishvarunyadav@ieee.org Dept. of Electrical and Electronics Engineering 

क्या हे स्वर्ग और मोक्ष द्वार

इस प्राचीन व अद्भुत मंदिर का निर्माण चूना पत्थर से किया गया है, जो आज भी अपनी उसी स्थिति में खड़ा हुआ है। द्वारका मंदिर में मूलतः दो प्रवेश द्वार हैं मुख्य प्रवेश द्वार उत्तर द्वार को मोक्षद्वारा द्वार कहा जाता है। यह प्रवेश द्वार मुख्य बाजार में ले जाता है। दक्षिण द्वार को स्वर्ग द्वार कहा जाता है।

द्वारिका के कण कण में भगवान श्री कृष्ण की झलक दिखाई देती हे, विद्वानों की माने तो जीवन के सभी पाप, गोमती नदी में नहाने से दूर हो जाते हे और द्वारिकाधिश के दर्शन मात्र से मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।

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